* हिंदू - मुस्लिम भाईचारे और एकता का प्रतीक 761वां उर्स ; महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश व गुजरात से उमड़े जायरीन
यावल / संवाददाता :- यावल तहसील के साकली गांव में स्थित हजरत कुतुब सज्जन शाह वली रहमतुल्ला अलै का 761वां उर्स सोमवार, 15 दिसंबर 2025 को बडे ही हर्षोल्लास, श्रद्धा और धार्मिक उत्साह के साथ मनाया गया। यह उर्स न केवल एक धार्मिक पर्व है, बल्कि हिंदू - मुस्लिम भाईचारे, आपसी एकता और सैकड़ों वर्षों की शानदार परंपरा का जीवंत प्रतीक भी है।
इस पवित्र उर्स में भाग लेने के लिए हर वर्ष की तरह इस बार भी महाराष्ट्र के साथ - साथ मध्य प्रदेश और गुजरात से बडी संख्या में जायरीन साकली पहुंचे। श्रद्धालुओं का मानना है कि बाबा की दरगाह पर सच्चे दिल से मांगी गई मुरादें पूरी होती है, इसी आस्था के चलते यहां हर साल भारी भीड़ उमड़ती है।
परंपरा के अनुसार आज भी सैय्यद मीरा के वंशज सैय्यद अहमद (मेंबर) के घर से दरगाह तक चादर पेश की जाती है। हजरत कुतुब सज्जन शाह वली रहमतुल्ला अलै का असली नाम शाह अब्दुल लतीफ रहमतुल्ला अलै बताया जाता है। वे ख्वाजा गरीब नवाज (अजमेर) रहमतुल्ला अलै के दौर के महान बुजुर्गों में से एक थे। बाबा की दरगाह की विशेषता यह है कि वह चारों दिशाओं से एक जैसी दिखाई देती है, जो अपने आप में अद्भुत स्थापत्य का उदाहरण है।
उर्स के अवसर पर मंगलवार, 16 दिसंबर 2025 को दरगाह के सामने वाले मैदान में रात 10 बजे से शानदार कव्वाली मुकाबले का आयोजन किया गया है। इस कव्वाली महफिल का आयोजन साकली ग्राम पंचायत के माजी उपसरपंच वसीम खान, हाजी आसिफ खान, माजी ग्राम पंचायत सदस्य सैय्यद अशफाक, सैय्यद शौकत एवं उनके साथियों द्वारा किया गया है।
इस मुकाबले में दिल्ली के मशहूर कव्वाल नौशाद अली खान (ख्वाजा जी तोरी शादी में मौला अली आए… फेम) और कानपुर की प्रसिद्ध कव्वाल शिबा परवीन आमने-सामने थे।
दरगाह के मुजावर सैय्यद अरमान बाबा और सैय्यद निसार बाबा अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा और श्रद्धा से निभा रहे है। दरगाह में होने वाली सभी धार्मिक विधियां उन्हीं की देखरेख में विधिवत रूप से संपन्न की जाती है।
कुल मिलाकर, साकली का यह उर्स श्रद्धा, सौहार्द, संगीत और सामाजिक एकता का अनुपम संगम बनकर एक बार फिर लोगों के दिलों को जोड़ने का कार्य कर रहा है।
